Monday, 9 September 2019

उत्तर प्रदेश में प्रदूषित नदियाँ

8 सितम्बर सेमिनार में आलेख प्रस्तुत करती सिमरन

नदियाँ प्राणी जगत के लिए बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। नदियों के किनारे बसे क्षेत्र भरे-पूरे होते हैं। सभी बड़े शहर बड़ी नदियों के किनारे ही बसे हुए हैं। इनके बिना हम सभ्यता और जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। पर बीते कुछ दशकों में नदियों का हाल बहुत खराब हो गया है। नदियाँ हद से ज्यादा प्रदूषित हो चुकी हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से प्राप्त अकड़ो के आधार पर भारत में 521 नदियों में 323 नदियों का पानी प्रदूषित हो चुका है और कुछ नदियों जैसे गंगा, यमुना का पानी नहाने लायक भी नहीं बचा है। बाकी स्वच्छ बची नदियों में ज़्यादातर छोटी नदियाँ हैं।
2007 में ही भारत की पवित्र कहे जाने वाली गंगा नदी दुनिया भर में पाँच सबसे प्रदूषित नदियों में शामिल की जा चुकी है और 10 सबसे प्रदूषित नदियों में भारत की एक और पवित्र कहे जाने वाली नदी यमुना भी शामिल है। ये दोनों ही नदियाँ उत्तर प्रदेश से होकर गुजरती हैं। विश्व जल निगरानी दिवस संगठन (डब्ल्यूडब्ल्यूएमडीओ) ने एक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि भारत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नदियाँ सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं जिसमें हिंडन, काली, यमुना जैसी नदियाँ नाले में परिवर्तित हो गयी हैं। इन नदियों के किनारे सैकड़ों कारखाने लगे हैं जिनके कचरे सीधे नदियों में डाल दिये जाते हैं साथ ही शहर भर के लाखों टन अपशिष्ट बिना उपचारित किए नदियों में बहा दिये जाते हैं। उत्तर प्रदेश में छोटी-बड़ी कुल 31 नदियाँ हैं जिनमें गंगा, यमुना, घाघरा, गोमती, हिंडन, काली प्रमुख हैं। ये नदियाँ कई बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं। उत्तर प्रदेश के बड़े मैदानी भागों को ये नदियाँ सिचती हैं। पेय जल, रोजी-रोटी जैसे खेती, मतस्य पालन, विद्युत उत्पादन और दैनिक दिनचर्या के काम के लिए लोग इन्ही नदियों और इनसे निकाले गए नहरों पर निर्भर करते हैं। पर आज हालत यह है कि जहाँ नदियाँ पहले पालनकर्ता कहलाती थी वही नदियाँ अपने क्षेत्र में कैंसर तक का कारण बन रही हैं।
प्रदूषित नदियाँ
नदियों के प्रदूषण की जाँच बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) स्तर के द्वारा की जाती है। बीओडी एक निश्चित समय अवधि में निश्चित तापमान पर किसी दिए गए पानी के नमूने में मौजूद कार्बनिक पदार्थ को तोड़ने के लिए सूक्ष्म जीवों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले आवश्यक विघटित ऑक्सीजन (यानी मांग) की मात्रा है। सुरक्षित पेय जल के लिए बीओडी 2 मिली ग्राम प्रति लिटर से कम होना चाहिए जबकि नहाने के लिए बीओडी 3 से ज्यादा नहीं होना चाहिए। पर उत्तर प्रदेश के 15 में से 11 नदियों का बीओडी 3 से अधिक पाया गया है। शुद्ध पेय जल में कम से कम 6 मिली ग्राम प्रति लिटर विघटित ऑक्सिजन होना आवश्यक है। 5 मिली ग्राम प्रति लिटर या इससे कम विघटित ऑक्सिजन होने पर पानी नहाने के लिए भी उपयुक्त नहीं होता। जैसे ही जल में प्रदूषण की मात्र बढ़ती है वैसे ही सूक्ष्म जीवों द्वारा इसे उपचरित करने के लिय विघटित ऑक्सिजन की माँग बढ़ जाती है और विघटित ऑक्सिजन की मात्रा में बहुत तेजी से कमी आती है। कई क्षेत्रों में शून्य विघटित ऑक्सिजन पाये गए हैं जिसे मृत क्षेत्र कहते है। मृत क्षेत्रों में जलीय प्रजातियों का जीवित रहना नामुमकिन है।
प्रदूषण के जाँच का दूसरा मानक है जल में अमलियाता या क्षारकता का होना है। सामान्य तौर पर पानी उदासीन प्रकृति का होना चाहिए। इसका पीएच मान 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए। पर कई स्तनों पर पीएच 9 से 10 के बीच पाया गया है। पानी में कोलीफॉर्म नामक बैक्टीरिया भी पाया जा सकता है जिससे पानी से होने वाली बीमारियाँ होती है। इसकी मात्रा अधिक होने पर इसमें रोगजनक बैक्टीरिया जैसे गियार्डिया और क्रिप्टोस्पोरिडियम पनपते हैं जिनका अभी तक कोई प्रभावी इलाज नहीं है। पेय जल में कोलीफॉर्म नहीं पाये जाने चाहिए फिर भी अधिक से अधिक 50 एमपीएन प्रति मिली लिटर तक कोलीफॉर्म होने पर इसे शुद्ध माना जाता है। पर वास्तव में इसकी संख्या हजारों गुणा ज्यादा पायी गयी है।
वहीं जल में भारी धातुओं के प्रतिशत मात्रा भी काफी बढ़ी हुई पायी गयी जो शरीर में अनेक रोगों को जन्म देते हैं। लोहा, तांबा, जस्ता के बढ़े हुए मात्रा घातक सिद्ध होते हैं। जबकि पारा, कैडमियम, आर्सेनिक, सीसा का जल में होना हानिकारक होता है।
इस आधार पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई नदियाँ जैसे हिंडन, काली, यमुना, रामगंगा गंभीर रूप से प्रदूषित हैं। इन नदियों के किनारे बसे क्षेत्रों में भूमिगत पेय जल भी प्रदूषित हो चुका है, पेट की बीमारी, त्वचा रोग, कैंसर जैसी बीमारियाँ तेजी से फैल रही हैं।
हिंडन नदी
यह 6 जिलों से गुजरती हुई यमुना में मिल जाती है। पिछले 5 सालों में अलग अलग जगहों पर इसके पानी में बीओडी या तो बढ़ा है या स्थिर है। कई जगहों पर औसत बीओडी 62 से भी ऊपर पायी गयी है जबकि विघटित ऑक्सिजन आदिकांश जगहों पर शून्य है। कोलिफोर्म बैक्टीरिया की संख्या लाखों एमपीएन प्रति एमएल है। सहारनपुर में लेड की मात्रा अनुमत सीमा से 179 गुणा अधिक पायी गयी। अन्य धातुओं की मात्रा भी गंभीर है। इसे गंभीर प्रदूषित नदियों के श्रेणी में रखा गया है।
काली नदी
इसमें कोलिफोर्म की मात्रा 5 करोड़ तक पायी गयी है। विघटित ऑक्सिजन शून्य हो चुका है। नाइट्राइट जिसकी मात्रा शून्य होनी चाहिए, 8.45 मिलीग्राम प्रति लिटर पायी गयी है। सीसा, मैगनीज लोहा, क्रोमियम जैसे तत्व अत्यधिक मात्रा में पाये गए है। इस नदी का पानी खेती के लिए भी उपायुक्त नहीं है। इससे उगाई जा रही सब्जियाँ भी रोगजनक सिद्ध हो रही हैं।
गोमती नदी
यह नदी अपने उद्गम स्थान से ही नाले में परिवर्तित हो चुकी है। इसके जल में जलकुंभी को छोड़ कर कोई वनस्पति या मछलियाँ जीवित नहीं रेह प रही हैं। इसमें मेथेन गैस के उठते हुए बुलबुले भी पाये गए हैं।
यमुना नदी
यानुना नदी दिल्ली से गुजरते हुए एक नाले में तब्दील हो चुकी है। पानी में अमोनिया की मात्रा बेहद खतरनाक स्तर पर है। दिल्ली में ही 1500 करोड़ लीटर अनुपचारित सीवेज और 500 लीटर औद्योगिक अपशिष्ट नदी में प्रत्येक दिन बहाये जाते हैं। नदी में बड़ी मात्रा में विषैले झाग पाये गए हैं। गौर तलब है कि घरेलू तथा औद्योगिक अपशिष्टों के आपस में मिल जाने के बाद उनका शोधन संभव नहीं हो पाता है।
गंगा नदी
ये सारी नदियाँ अलग अलग जगहों से होते हुए अपने साथ लाये हुए कचरे के साथ गंगा में मिलती हैं। इसका पानी नहाने लायक भी नहीं बचा है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अध्ययन के अनुसार गंगा इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि इसके किनारे बसने वाले लोगों को कभी भी कैंसर हो सकता है। बनारस में इसके पानी में ज़िंक, कैडमियम, तांबा, क्रोमियम जैसे भरी धातु कि मात्रा बहुत उच्च पायी गयी है और सीसा बहुत खतरनाक स्तर पर लगभग हजार गुना तक मौजूद है। पिछले कुछ सालों के दौरान गंगा कि सफाई के लिए लगभग 3000 करोड़ रुपये खर्च किए गए पर इसके पानी कि गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं आया है।
नदियों के प्रदूषण के मुख्य कारण
नदियों के प्रदूषण के मुख्य कारण औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू अपशिष्ट का बिना उपचार किये नदियों में बहाया जाना है। इसके आलवे खेती में हानिकारक कीटनाशकों का प्रयोग, धार्मिक रीति-रिवाज के अवशेष, प्लास्टिक कचरे, जल का दोहन आदि भी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं।
औद्योगिक अपशिष्ट में जल में बड़ी मात्रा में तेल, रसायन, विषैले पढ़ार्थ, भारी धातु मौजूद होते हैं जिन्हे शोधित करके नदियों में बहाया जाना चाहिए पर अधिकांश उद्योग पर्यावरण सुरक्षा मानकों को ताख पर रखकर पूरा कचरा नदियों में उड़ेल देते हैं। उत्तर प्रदेश के 700 से अधिक फ़ैक्टरियों से प्रतिदिन लगभग 550 मिलियन लिटर नदियों में निर्वहन किया जाता है। इसमें उपस्थित तेल के कण सतह के ऊपर आने से जल का वायु से संपर्क तोड़ देते हैं। भारी धातुओं के कण अवक्षेपित हो जाते हैं। रसायनों के मिलने से जल का पीएच मान बढ़ जाता है। ये जल फिर खेती के लिए भी उपयुक्त नहीं होते हैं। औद्योगिक क्षेत्रों में जल में पाये जाने वाली कई प्रजातियाँ जीवित नहीं रह सकती (54 में से केवल 9 जीवित रह सकती हैं)।
घरेलू अपशिष्ट जिसमे कार्बनिक पदार्थ होते हैं। साथ ही नाइट्रोजन, फास्फेट, पोटैशियम बड़े मात्रा में उपस्थित होते हैं। ये पोषक तत्व जरूरत से ज्यादा मात्रा में जल में घुल जाते हैं जिससे जलीय पौधों का तेजी से बढ्ने का खतरा रहता है। इस क्रम में और कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने में ऑक्सिजन बड़ी मात्र में खपत होती है। फलस्वरूप जल में ऑक्सिजन कम होते होते शून्य स्तर तक पहुँच जाता है। इससे जलीय जीव-जंतुओं के जीवन पर खतरा मंडराना शुरू हो जाता है। केवल यमुना में ही प्रतिदिन 10 लाख लीटर से ज्यादा घरूलु अपशिष्ट बहाये जाते हैं जो दिल्ली से निकले कुल अपशिष्ट का दो तिहाई हिस्सा है।
घरेलू अपशिष्ट के निपटान के लिए मलजल उपचार संयंत्र होना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश में केवल 20 जिलों में 59 मलजल उपचार संयंत्र स्थापित है जिसमे 57 परिचालन में है। इनमें केवल 15 प्रतिशत अपशिष्ट का निपटान किया जाता है। अपशिष्ट का निपटान लंबा और खर्चीला प्रक्रिया है। इसलिए इससे होने वाले नुकसान पर ध्यान दिये बिना नदियों में सीधा बहा देना ज्यादा आसान और सस्ता प्रतीत होता है। दूसरी तरफ खेती में प्रयुक्त उर्वरक और कीटनाशकों के कारण मिट्टी में नाइट्रेट की मात्रा काफी बढ़ जाती है जो पानी के साथ नदियों में आकार मिल जाती है। पानी में नाइट्रेट की मात्रा शून्य होनी चाहिए पर नदियों में कई जगह नाइट्रेट के बुलबुले पाये गए।
यदि घरेलू अपशिष्ट को जो कि उर्वरक है, मिट्टी के लिए पोषक तत्व का काम करती है, उपचारित करके इससे प्राप्त खाद को खेतों में प्रयोग करके प्रकृतिक तरीके से खेती कि जा सकती है। अपशिष्टों का इतने बड़े पैमाने पर नदियों नालों में बहाया जाना एक ओर इनकी बरबादी है तो दूसरी ओर नदियाँ अत्यधिक प्रदूषित होते जा रही हैं। इस प्रकृतिक तरीके से खेती में सबसे बड़ी रुकावट है ये उर्वरकों, कीटनाशकों की बड़ी-बड़ी अन्तरराष्ट्रीय कंपनाइयाँ जिनका उद्देश्य केवल मुनाफे तक केन्द्रित होता है। पर इसका नुकसान आम लोगों को भुगतना पड़ता है।
पर्यावरण के संतुलन के लिए ये आवश्यक है कि आम जनता आगे बढ़कर इन प्रक्रियाओं में हिस्सेदारी ले और विकास के इस उल्टी दिशा को जो विनाश के ओर ले जा रही है, सही दिशा में संचालित करें।
-सिमरन

सूखा-लेकिन क्यों-- कौन है इसका जिम्मेदार


पेपर प्रस्तुति-राजेश कुमार
रसायन विज्ञान,एमिटी इंटरनेशनल स्कूल, नोएडा
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट-एक दिवसीय सेमीनार” आयोजक-पर्यावरण लोक मंच मेरठ
तारीख-8 सितम्बर 2019

परिचय

‘डाउन टू अर्थ’ प्रकाशन की एक किताब है -"ड्रॉट बट व्हाई"। केवल 126 पेज की यह किताब करोड़ों भारतवासियों की जिंदगी के बारे में कहानी बताती है। यूँ तो इस किताब में ज्यादातर आंकड़े और तथ्य 2014 से 2017 तक के हैं। पर यह किताब की सीमा बिलकुल नहीं बने हैं। बल्कि इस ढंग से किताब को लिखा गया है कि वह आजादी के बाद के गरीब भारत से शुरू होकर आज के अमीर होते भारत की कहानी बताती है। पर्यावरण संकट के प्रभावों में सूखा और बाढ़ मुख्य हैं। सूखा आज देश भर में विकराल समस्या बनी हुई है। अब यह उतनी प्राकृतिक नहीं है जितनी यह मानव निर्मित है। यही इस रिपोर्ट का मूल है। आज की गई समाज में उत्पादन की गतिविधियाँ कल की सूखा को बुलाती हैं। सूखा बाकायदा न्यौते पर आता  है। 1997 के बाद सूखा प्रभावित क्षेत्रों में 57 फीसदी की वृद्धि हुई है। 

समस्या

आज ग्रामीण और शहरी जीवन में सूखा से आने वाली समस्याओं से कौन परिचित नहीं  है? सूखा से निपटने के लिए सरकारी कदम भी उठाये जा रहे हैं, पर वह ऊँट के मुँह में जीरे के समान हैं। गाँव में रोज़गार के साधन कम हो रहे हैं। शहरों की आबादी बढ़ रही है। अन्य समस्याओं के साथ पानी की विकराल समस्या भी हर किसी को अपने चपेट में ले रही है। आज स्थिति यह हो गयी है कि विकास की दौड़ में सबसे आगे मेट्रो शहरों के पास अपने उपयोग के लिए पर्याप्त पानी नहीं है। दिल्ली के लिए पानी 300 किलोमीटर दूर हिमालय की घाटी में बने टिहरी डैम से आता है। हैदराबाद के लिए 105 किलोमीटर दूर कृष्णा नदी पर बने नागार्जुनसागर डैम से पानी आता है तो बैंगलौर में पानी की आपूर्ति 100 किलोमीटर दूर कावेरी नदी से की जाती है। उदयपुर अपनी झीलों के सहारे पानी की आपूर्ति करता है। यह झील अब सूखने के कगार पर हैं। शहरी जीवन भयंकर सूखा की गिरफ्त में है। 

ग्रामीण जीवन को सूखा और ज्यादा प्रभावित करता है। क्योंकि खेती से लेकर पशु-पालन तक सब पानी पर निर्भर है। सूखा पड़ने से पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है। गाँव से शहरी इलाकों की ओर पलायन शुरू हो जाता है। हरियाणा के मेवात जिले की एक घटना है। 2015 की गर्मियों में किसानों ने धान की पौध लगाई। पहली बारिश में देरी हो गयी। किसानों ने किसी तरह डीज़ल से ट्यूबवेल चला कर सिंचाई की। इसके बाद पौध तैयार थी। पर अचानक एक रात भयंकर तूफ़ान के साथ पाँच घण्टे झमाझम बारिश हुई। करीब 250 मिमी बारिश हुई। खेत पानी से डूब गए। इस क्षेत्र में सालभर में करीब 500 से 600 मिमी बारिश होती है,पर एक ही दिन में अचानक इतनी बारिश ने सब बर्बाद कर दिया। ऐसी स्थिति में किसानों की आँखों में आँसू के सिवा और क्या होगा? दूसरी घटना जम्मू की है। ठण्ड कम होने की वजह से जम्मू में लीची पर बे मौसम फूल आ गया। जैसे ही ठण्ड बढ़ना शुरू हुई फूल गिर गए। पूरी फसल मारी गयी। किसान मुँह देखते रह गए।

 उधर मध्यप्रदेश में छोटे बच्चे स्कूल जाने की जगह अपनी माँ के साथ दिनभर पानी की खोज में भटकते रहते हैं। 

शहरों में उद्योग और फैक्ट्री साफ़ पानी को लेते हैं और बदले में लौटाते हैं - कचरा, गंदे नाले और प्रदूषित पानी। गाँव में किसान कुएँ को गहरा और गहरा करते जाते हैं। हर कोई पानी की अंतिम बूँद को निचोड़ लेना चाहता है। आज सूखा गरीब भारत के सर पर कोई प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि अमीर होते भारत की नीतियों की देन है। इससे निपटने के लिए सूखा क़ानून को बदलने की जरूरत है। पानी की हर बूँद को बचाकर फिर से भूजल को पुनर्भरण करने की जरूरत है। इसके लिए हमें लाखों नए जलाशय बनाने होंगे। यह स्थानीय लोगों से सलाह मशविरा करके इस तरह बनाये जाएँ कि इनमें इकट्ठा पानी को लोग अपने रोजमर्रा के कामों में उपयोग कर सकें। रोजगार पैदा करने के लिए कहीं भी गड्ढा खुदवाने से काम नहीं चलेगा। ऑस्ट्रेलिआ और कैलफोर्निया में भी सूखा आया पर वहां की सरकारों ने गैर जरूरी पानी के खर्चे पर तुरन्त रोक लगा दी। भारत में भी यही करना होगा। इन प्रयासों से हम रोज-ब-रोज उद्योग, खेती, और घरेलू स्तर पर पानी बचा सकेंगे। साल-दर-साल हमारी बचत बढ़ती चलेगी। इस तरह हमें नियमित रूप से आ रहे सूखा से निजात मिलेगी। 
फोटो-1 कर्णाटक के गाँव यारागुप्पी का एक दृश्य

सरकार का नज़रिया

प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का वायदा किया है। इस वायदे की भी पड़ताल जरूरी है ।  “राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षण संगठन” के अनुसार 2003 से 2013 तक आते-आते खेती में आय ₹1060 से बढ़कर ₹3844 प्रतिमाह हो गयी। खेती में आय 13.7 फ़ीसदी सालाना की दर से बढ़ी। यह तब है जब इस दशक में प्राकृतिक आपदा और सूखा अपेक्षाकृत कम रहीं हैं। मनरेगा ने भी ग्रामीण इलाकों में लोगों की आय में इजाफा किया। किसानों की 2022 तक दोगुनी आय के  लिए खेती में आय 15 फीसदी प्रतिवर्ष की दर  से बढ़नी चाहिए। जोकि पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए कोई नया करिश्मा नहीं है। जो रफ़्तार अभी है उसी से वे 2022 तक दोगुनी आय तक पहुँच जाएँगे। 

 साथ-साथ बढ़ती मँहगाई किसानों की कमर तोड़ती रहेगी। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो भी जाय तो तब तक उनका बिजली बिल भी दोगुना हो जायेगा, पढ़ाई का खर्चा दोगुने से भी ज्यादा हो जायेंगे । दवाइयों की कीमत दोगुनी होजायेगी। आने जाने का किराया दो गुना होजायेगा। यानी किसानों को 2022 तक दोगुनी आय से कोई भला नहीं होने वाला। बस आँकड़ों के बाजीगर दोगुनी आय का गाना गाकर राजनीति चमका रहे हैं।

 इसी व्यवस्था में एक अच्छा उदाहरण

एक गाँव का उदाहरण भी है जो बहुत ही रोचक और प्रोत्साहित करने वाला है। महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले का एक गाँव है-‘हिवरे बाजार’ इस गाँव में 1989 से पहले लोग सूखा से तंग आकर गाँव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। चोरी, छीना - झपटी के मामले बढ़ रहे थे। 1990 में सरपंच पवार की अगुआई में गाँव में खेती की सिंचाई का तरीका बदला। सरकारी सहायता से ड्रिप सिंचाई शुरू की। ग्राम पंचायत ने केला और गन्ना की फसलों पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी। क्योंकि इनके लिए ज्यादा पानी चाहिए।  ग्राम पंचायत ने मिलकर पानी को इकट्ठा करना शुरू किया। 1995 तक आते-आते  गाँव में पानी का स्तर 30 फुट पर आ गया जो पहले 120 फुट से भी ज्यादा नीचे था। 2016 में बारिश कम हुई, ग्राम पंचायत की बैठक हुई, उन्होंने तय किया कि बाजरा उगाया जाय। जिससे कम पानी में भी सब की फसल अच्छी हो सके। वहाँ 50 फीसद कम बारिश पर भी फसल उत्पादन में कोई कमी नहीं आयी। बिना बारिश के भी गाँव के खुले कुएँ में 10-12 फुट की गहराई पर पानी था।  इस गाँव में साक्षरता दर सौ फीसदी है। यह गाँव प्रति व्यक्ति आय के मामले में देशभर में सबसे ऊपर है। पचास फीसद से ज्यादा परिवार दस लाख सालाना से ज्यादा कमाते हैं, इनमें छः घर ऐसे भी शामिल हैं जिनके पास कोई जमीन नहीं है। 

कैसे किसी गाँव को दस साल में सूखा रहित बनाएँ ?

किसी भी गाँव को सूखा रहित बनाया जा सकता है। नीचे दिए गए चार चरण में इस प्रक्रिया को समझाया गया है।

 पहला चरण-पहले दो साल में पुराने पानी भण्डार की जगहों को साफ़ सुथरा किया जाय और नए क्षेत्र बनाने के लिए निवेश किया जाय। हर गाँव के पास औसत 224 हेक्टेयर जमीन है। यह जमीन 2.44 अरब लीटर पानी इकट्ठा कर सकती है। इतना पानी पीने के लिए, घरेलू उपयोग के लिए और सिंचाई के लिए पर्याप्त है। इससे केवल दो साल बाद ही पर्याप्त मात्रा में पानी धरती में रिचार्ज हो जायेगा, इकट्ठा हो जायेगा। तब सूखा से लड़ा जा सकता है। फ़ोटो 2-गाँव गाँव ऐसे तालाब बनाने होंगे 

दूसरा चरण - अगले तीन से पाँच साल के भीतर खेती की मानसून पर निर्भरता घटेगी और खेती को एक नया जीवन मिलेगा। कम बारिश वाले इलाकों में छोटे किसान दूसरी फसल भी उगा सकेंगे। इससे उनकी आमदनी बढ़ेगी। गाँव से शहर में पलायन कम होगा।सरकारी सहायता से बीज का वितरण और फसल बीमा से किसानों में आत्मविश्वास बढ़ेगा। सही फसल के चुनाव से उत्पादन ज्यादा होगा और खुशहाली बढ़ेगी। 
फोटो-2 स्वच्छ तलब का एक दृश्य

तीसरा चरण- छः से आठ साल के भीतर पशुपालन और मछली पालन बढ़ जाएगा। एक अच्छी दूध देने वाली गाय या भैंस से कोई भी 85 रुपये प्रतिदिन कमा सकता है। अगर उसे  भैस के लिए चारा मिल जाए। यह आय ग्रामीण गरीबी रेखा से लगभग चार गुना ज्यादा है।  नॉन वेजिटेरियन खाने की माँग अच्छी खासी है । रिपोर्ट बताती हैं कि राजस्थान में औसत एक किसान खेती से जितना कमाता है उससे दोगुनी कमाई दस बकरियों को पालने से हो जाती है। इससे किसानों को और जिनके पास जमीन नहीं हैं उन लोगों को भी अतिरिक्त आय का साधन मिलेगा। यह अतिरिक्त आय सूखा जैसी विपत्ति से लड़ने में उन्हें सहायता करेगी।


फोटो-3 मछली पालन से अतिरिक्त आमदनी

चौथा चरण- नौवें और दसवें साल तक ऐसी परिस्थिति बन जाएगी कि किसान अब बागवानी और पेड़ लगा सकते हैं। अब वे नकदी फसल उगा सकते हैं। इस समय बागवानी कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है। अनाज से ज्यादा पारिश्रमिक इसमें है। इसमें सरकार को गाँव गाँव से देशभर में सही वितरण की व्यवस्था करनी होगी।  इससे एक तरफ खेती की मानसून पर निर्भरता ख़त्म होगी दूसरी  खेती से जुड़े लोगों की आय में बढ़ोत्तरी होगी। इस तरह देश को सूखा से निजात मिलेगी। 

पर्याप्त पानी होगा तो नकदी फसल की खूब पैदावार होगी।

फ़ोटो 4-पर्याप्त पानी से नकदी फ़सल की पैदावार

निष्कर्ष

सूखा की समस्या अब नियमित बन गयी है और सूखा क्षेत्र दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में समस्या का सही आकलन और समाधान दोनों जरूरी है। सूखा से लड़ना असंभव नहीं है। इस रिपोर्ट में बताये गए समाधान अगर हर ग्राम पंचायत में लागू हों तो सूखा रहित गाँव बनाये जा सकते हैं। मानसून पर खेती की निर्भरता कम की जा सकती है। खेती पर निर्भर लोगों की जिंदगी में खुशहाली आ सकती है। 

सीमाएँ

जो मॉडल पेश किया है उसकी अपनी सीमाएं हैं क्योंकि ग्रामपंचायत के हाथ में आज भी इतनी ताकत नहीं है कि वे अपनी समस्याओं का केंद्र से समाधान करा सके। फिर भी आज के दौर में सब के मिले-जुले प्रयास से इस मानव निर्मित आपदा से निपटना संभव है। “ड्रॉट बट व्हाई” किताब सूखा से बढ़ी परेशानियों की बारीकी से पड़ताल करती है और उम्मीद की एक किरण भी जगाती है। हर ग्राम पंचायत में इस मॉडल पर बहस हो तो एक नयी शुरुआत हो सकती है। 

सन्दर्भ

“ड्रॉट बट व्हाई”-ए डाउन टूअर्थ पब्लिकेशन 
https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/1/15/Flaxpits_-_The_village_pond_at_Winterbourne_-_geograph.org.uk_-_58767.jpg
https://images.livemint.com/rf/Image-621x414/LiveMint/Period2/2016/09/06/Photos/Processed/horticulture-kICE--621x414@LiveMint.jpg
https://pushkarv.org/drought/