Monday, 11 May 2026

देहरादून में पृथ्वी दिवस पर सेमिनार का आयोजन

  प्रस्तुतकर्ता – सतेन्द्र सिद्धार्थ


‘जब धरती जल रही हो तो चुप नहीं रहा जा सकता.’ बल्कि चुप रहना एक गुनाह है. इसी थीम के साथ देहरादून में पृथ्वी दिवस के अवसर पर 26 अप्रैल को एक सेमिनार का आयोजन हुआ. इसका आयोजन पर्यावरण लोक मंच और भारत ज्ञान विज्ञान समिति ने संयुक्त रूप से किया. सेमिनार का विषय ‘पर्यावरण संकट: समस्या और समाधान’ था. जानेमाने पर्यावरणविद डॉ. रवि चोपड़ा और पदमश्री कल्याण सिंह रावत इस सेमिनार में मुख्य वक्ता थे. पर्यावरण लोक मंच के संस्थापक विक्रम प्रताप मुख्य अतिथि वक्ता थे. इनके अलावा डॉ. उमा भट्ट, डॉ. जगदीश पांडे, डॉ दिनेश, विजय भट्ट ने सेमिनार में अपनी बात रखी. सेमिनार दो सत्र में सम्पन्न हुआ. पहले सत्र का संचालन पर्यावरण लोक मंच की ओर से प्रवीन ने किया. भारत ज्ञान विज्ञान समिति के सोहन सिंह रावत ने दूसरे सत्र का संचालन किया.

पर्यावरण संकट की भयावता से कोई भी अछूता नहीं है. इसकी सही समझ के बिना हम अँधेरे में तीर चलाते रहेंगे. इसलिए देहरादून, रूडकी, सहारनपुर और मेरठ से छात्र, शोधार्थी और नौजवान सेमिनार में शामिल हुए.

उत्तराखण्ड के जनकवि गिरीश चन्द्र तिवारी 'गिर्दा' की कविता “एक तरफ बर्बाद बस्तियाँ – एक तरफ हो तुम....“ से कार्यक्रम की शुरुआत हुई. जिसे ‘पर्यावरण लोक मंच’ के साथियों ने गाकर सुनाया. ‘गिर्दा’ आगाह करते हुए सवाल पूछते है ‘लेकिन डोलेगी जब धरती – बोल व्यापारी – तब क्या होगा ?

धरती के तापमान में 1.2 डिग्री बढ़ोतरी कोई मामूली बात नहीं, इसने पूरी दुनिया में कहर बरपा रखा है-- ग्लेशियर का पिघलना, समुन्द्र का जलस्तर बढ़ना, भूस्खलन, कहीं बाढ़ कहीं सूखा, रेगिस्तानों का विस्तार जैसी आपदाओं ने धरती माँ के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है. पेड़-पोधों और जीव-जन्तुओं के साथ मानवता का अस्तित्व खतरे में है. इनसे किसी भी संवेदनशील इनसान का बेचैन हो जाना लाजमी है. धरती माँ का यह संकट प्रकृतिक नहीं मानवनिर्मित है. इस संकट का जिम्मेदार है देशी-विदेशी पूंजीपति वर्ग.

संचालक प्रवीण ने ‘कोचाबाम्बा सम्मलेन’ का घोषणापत्र पढ़कर सेमिनार का पहला सत्र शुरू किया. इस घोषणापत्र में धरती माँ को बचाने की अपील की गयी है. इसके साथ ही उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में पर्यावरण बचाने के लिए संघर्षरत आवाम के बारे में बताया.

सेमिनार के पहले वक्ता डॉ दिनेश ने बताया कि धरती का मौजूदा संकट अचानक पैदा नहीं हुआ. 1960 में ‘साइलेंट स्प्रिंग’ नाम की एक किताब ने अमेरिकी एग्रीकल्चर इंडस्ट्री की करतूतों का खुलासा किया. अमेरिकी एग्रीकल्चर इंडस्ट्री खेतों में डीडीटी रसायन के इस्तेमाल को बहुत बढ़ावा दे रही थी. जबकि यह पर्यावरण के लिए खतरनाक है. इससे कैंसर जैसी बीमारियां फैलाती है. इस घटना से यह साफ़ पता चलता है कि उद्योगपति अपने मुनाफे के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.

डॉ दिनेश ने कहा कि आज शासक वर्ग की करतूतों ने हवा, पानी और मिट्टी सब जहरीले बना दिए है. और मीडिया द्वारा प्रचार किया जाता है कि इसकी जिम्मेदार आम आवाम है. तमाम वैज्ञानिक रिपोर्टो में यह साफ़ जाहिर हो गया है कि हमारे महानगरों की हवा और नदियाँ उद्योगिक कम्पनियों की वजह से प्रदूषित हो रही है. लेकिन इन कंपनियों के मालिकों और सरकार पर ऊँगली न उठे, इसके लिए पूरी जनता को गुनहगार बताया जा रहा है. मालिकों और सरकार को सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब है. अन्त में उन्होंने कहा कि धरती का मौजूदा संकट छोटे-छोटे सुधारों के बजाय बड़े बदलाव से ही हल होगा.

सेमिनार की दूसरी वक्ता डॉ उमा भट्ट ने कहा कि स्थानीय स्तर पर भी पर्यावरण संकट के मुद्दों को उठाना होगा. उत्तराखण्ड में विकास के नाम पर पर्यावरण विनाश की योजनाएं लागू हो रही है. पहाड़ों और जंगल कथित विकास के लिए काटे जा रहें है. युवा पीढ़ी को इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करनी होगी. उन्होंने चिपको आन्दोलन की ऐतिहासिक भूमिका बतायी. यह आन्दोलन पहाड़ के जंगलों की कटाई के खिलाफ केवल 27 महिलाओं ने 1980 के दशक में शुरू किया था. इस आन्दोलन की वजह से जंगलों की कटाई करने वाली कम्पनी को अपना फैसला वापस लेना पड़ा था. उन्होंने कहा कि महिलाएं पर्यावरण के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती है. पहाड़ी महिलाएं घर और खेत का एक-एक कोना पेड़-पोधों और वनस्पतियों से सजाती है. ‘जब तक आवाम एकजुट होकर इसके खिलाफ आवाज बुलन्द नहीं करती हालात बद्दतर होते रहेंगे.’ इसी के साथ अपनी बात खत्म की.

पहले सत्र के मुख्य वक्ता डॉ रवि चोपड़ा ने पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन (पीपीटी) के साथ अपनी बात कही. पर्यावरण के अलग-अलग हिस्सों के संकट को उसके इतिहास से जोड़कर  बताया. विशेष रूप से उत्तराखण्ड की बदलती हुई आबोहवा और आपदाओं की आमद के पीछे के कारणों पर बात की. उन्होंने कहा कि आज प्रकृतिक आपदाओं की बड़ी वजह है-- जंगलों का कटाव, संवेदनशील क्षेत्रों में सड़क, होटल, बांधों का निर्माण और भारी भरकम इनसानी भीड़. इसने पहाड़ों का तापमान बढ़ा दिया है. पहाड़ पर बर्फ पिघलने से झीलों की संख्या और क्षेत्रफल दोनों एकसाथ बढ़ रहे है. यह आपदाओं की आमद के संकेत है. केदारनाथ और सिक्किम में आपदा इन्हीं वजहों से आयी थी.

इसके साथ ही उन्होंने बताया कि लार्ड डलहोजी के समय में उत्तराखण्ड में जगलों का भारी कटान हुआ था. यहाँ से मैदानों में लकड़ी और ईधन की पूर्ति की जाती थी. ब्रिटिश हुकूमत ने शासन की चौकसी और व्यापार को निगाह में रखकर मसूरी और शिमला जैसे शहर बसाये. वन क्षेत्रों से व्यापार के लिए वन विभाग बनाया.

1947 में ब्रिटिश हुकूमत से देश आजाद हुआ. 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद भारत सरकार और सेना ने चीनी सीमा के नजदीकी क्षेत्रों में ‘आर्मी केन्ट’ बनाये. पहाड़ों में सेना के भारी वाहनों की आवाजाही के लिए रास्ते तैयार किये गये. इसपर भूगोल वैज्ञानिको ने पर्यावरण के नुकसान के बारे में चेताया. पहाड़ों क्षेत्रों में इस तरह की बसावट और भारी वाहनों की आवाजाही नुकसानदेह हैं. इसका ताजा उदाहरण जोशीमठ है. जोशीमठ में सेना के भारी भरकम ट्रकों की लगातार आवाजाही और लोगों की बसावट से उसके अस्तित्व पर संकट आ गया.

डॉ रवि चोपड़ा ने आगे कहा कि हिमालय के पहाड़ कच्चे हैं. मैदानी क्षेत्रों के लिए बनायी गयी योजनाएं बिना जांचे-परखे पहाड़ों में लागू की जा रही है. वन विभाग वनों के लिए खतरा बन गया है. अंग्रेजी हुकूमत के भी बहुत पहले से वन पंचायतें वनों की रखवाली करती आयी थी. वन विभाग की जगह आज उन्हीं की जरुरत हैं. आखिर में उन्होंने गांधीजी के हवाले से विकास को परिभाषित किया और कहा कि आज हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें लोगों की संवेदना इंसानियत और प्रकृति की तरफ हो.

इसके बाद सत्र के अतिथि वक्ता और ‘पर्यावरण लोक मंच’ के संयोजक विक्रम प्रताप ने अपनी बात रखी. उन्होंने बताया कि ‘पर्यावरण लोक मंच’ मौजूदा पर्यावरण संकट को दो अहम नजरिये देखता है-- समग्र दृष्टिकोण और वर्ग नजरिया. समग्र दृष्टिकोण से हम पर्यावरण की सभी समस्याओं को भी दो भागों में समझते हैं. पहली परिवर्तनीय समस्याएं और दूसरी अपरिवर्तनीय समस्याएं. नदियों का गन्दा होना, हवा का ख़राब होना आदि परिवर्तनीय समस्याएं है जिन्हें सही समाधान कर वापस उनके अपने प्राकृतिक रूप में लाया जा सकता है. वहीँ धरती का तापमान बढ़ना, ग्लेशियर का पिंघलना और जंगलों का कटान आदि जलवायु परवर्तन अपरिवर्तनीय समस्याएं हैं. धरती का बढ़ा हुआ तापमान और पिघले हुए ग्लेशियर वापस नहीं आ सकता. इसके साथ ही हजारों-लाखों सालों में एक विशेष पारिस्थितिकी तंत्र के साथ तैयार हुए जंगलों को दौबारा हासिल नहीं किया जा सकता है. पर्यावरण की स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समस्या को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकटा.

‘पर्यावरण लोक मंच’ की स्थापना के समय बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा समझता था कि पर्यावरण का कोई संकट नहीं है. और दूसरा जो इसे संकट के रूप में देखता था, भयानक भटकाव का शिकार था. वह उन्ही संस्थाओं और देशों से इसके समाधान की उम्मीद लगा रहा था जिन्होंने पर्यावरण की यह दुर्दशा की है.

पूरी दुनिया में अमेरिका और यूरोपीय देश सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करते हैं. इसकी वजह से धरती का औसत तापमान 1.5 डिग्री बढ़ गया है. कार्बन उत्सर्जन कम करने के नाम पर क्योटो प्रोटोकॉल, कोपेनहेगन और बाली आदि सम्मलेन हुए. इनमें गरीब देशों पर ही कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव डाला गया. इन सस्थाओं में शासक वर्ग के लोग अय्यासी करने जाते थे और समस्या के बारे में अलग राय रखते थे. इन सम्मेलनों से समस्या हल होने के बजाय बढती चली गयी.

अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति ट्रम्प ने खुद को ऐसी संस्थाओं से अलग कर पर्यावरण संकट को भी ख़ारिज कर दिया. साफ़ जाहिर अमीर देशों का पर्यावरण संकट पर ऐसे सम्मलेन एक नौटंकी के सिवाय कुछ नहीं है.

इसके बाद उन्होंने बताया कि अमेरिका की पेट्रोलियम कम्पनी एक्शनमोबिल पर्यावरण संकट पर झूठ फैलाती हैं. यह पेट्रोल ईधन उद्योग में दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनियों में एक हैं. यह अपनी दर्जनों वेबसाइटों के जरिये बुद्धिजीवियों और शोधार्थियों को गुमराह करती है. और पर्यावरण संकट से इनकार करती है. अपने मुनाफे के लिए हमारी धरती माँ को निगल रही है.

इसके आगे विक्रम प्रताप ने बताया कि साम्राज्यवादी देश खतरनाक परमाणु संयत्रों और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को अपने यहाँ से बन्द कर भारत जैसे गरीब देशों पर थोप रहें हैं. ये गरीब देशों की जनता की जिन्दगी को नरक बना देंगे. वर्गीय नजरिये से ही हम इनकी करतूतों को देख सकते हैं. कार्बन डेटिंग और कार्बन फुटप्रिंट जैसे प्रपंच रचते हैं. और पर्यावरण संकट को मेहनतकश आवाम पर थोपते हैं. क्या उद्योगों के मालिक और किसान-मजदूर इस संकट के बराबर जिम्मेदार हैं? अपनी बात को बढाते हुए उन्होंने कहा कि ‘आज पर्यावरण संकट का सवाल समाज के आमूलचूल परिवर्तन के साथ जुड़ गया है.’

सत्र के संचालन के दौरान समय-समय पर प्रवीण ने बताया कि धरती माँ का मौजूदा संकट साम्राज्यवादी देशों की देन है. ये देश अपने मुनाफे और अय्यासियों के लिए धरती माँ के जिस्म को छलनी कर रहें हैं. इनकी हवस धरती माँ के जिस्म को कुचलती हुई औरतों के जिस्म तक पहुँचती है. जहाँ कहीं इसका विरोध होता है वहाँ बम गिराया जाता हैं. एप्सटिन मामले में लड़कियों का यौन शोषण और अमेरिका का ईरान में बच्चियों के स्कूल पर बम गिराना इनके इस वहसीपन को ही उघाड़ता हैं.

आज पूरी दुनिया में धरती माँ के प्रति अपनी जवाबदेही समझने वाले लोग संघर्षरत हैं. वे लोगों को इस मुद्दे पर एकजुट और जागरूक करने की कोशिश रहें है. 1990 में क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रों ने पर्यावरण संकट पर कहा था कि अगर हमनें इसे आज अपना अहम मुद्दा नहीं बनाया तो कल बहुत देर हो जाएगी.

पहले सत्र का समापन संस्कृतिककर्मी सतीश धोलाखंडी ने जनगीत गाकर किया.

दूसरा सत्र पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन (पीपीटी) का था. इस सत्र के मुख्य वक्ता पदमश्री कल्याण सिंह रावत थे. इस सत्र में पीपीटी के माध्यम से स्थानीय और राष्ट्रीय समस्याओं को दिखाया गया. सत्र की शुरुआत और संचालन करते हुए सोहन सिंह रावत ने उत्तराखण्ड के मौजूदा हालात का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि हाईवे-एक्सप्रेसवे का अन्धाधुन्ध निर्माण हो रहा है. पर्यटन के नाम पर बेताहाशा भीड़ ने उत्तराखण्ड की खूबसूरत दिखने वाली तस्वीर को बदसूरत कर दिया है. हमें इस पर सचेत ध्यान देना होगा.  

दूसरे सत्र की शुरुआत में विजय भट्ट ने पीपीटी से देहरादून के जंगल और आबोहवा के अलग-अलग पहलुओं और इनकी महत्ता के बारे बताया.

इनके बाद शोधार्थी अरुण ने आसन नदी किनारे बने कूड़े के पहाड़ के बारे में बताया. यह शीशमबाड़ा कचरा प्लांट है. जिसे सारे कानूनों को ताक पर रख कर मंजूरी दी गयी. इस प्लांट की वजह से इलाके की हवा, पानी और जमीन भयानक रूप से प्रदूषित हो चुकी है. गन्दी हवा की बदबू लोगों के जहन में समा गयी है. नलों से निकलने वाला लाल पानी लोगों की जिन्दगियां लील रहा है. फसलें ख़राब होने लगी है. गाँव में बीमारियाँ फ़ैलने से लोग असमय मौत का शिकार हो रहे हैं. इस मामले में मुख्य बात यह है कि यह कचरा इस जगह का नहीं है बल्कि देहरादून शहर से इकठ्ठा कर यहाँ डाला जाता है. इस प्लांट के खिलाफ लोगों ने कई बार विरोध-प्रदर्शन किया, लेकिन किसी भी नेता या अधिकारी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. क्योंकि कम्पनी ने इलेक्ट्रोरल बोंड के जरिये चन्दा अलग-अलग पार्टियों के खाते में जमा किया है. पर्यावरण प्रदूषण से निपटने की सरकार की यह नयी नीति हैं. शहरों को चमकाओं और उनका कूड़ा-करकट गाँवों में उडेलों. करे कोई भुगते कोई.

अरुण के बाद शोधार्थी तस्मिया ने हिंडन नदी की त्रासदी और उसके किनारे बसे लोगों की जिन्दगी पर अपनी पीपीटी दिखायी. यह नदी देहरादून की पूर्वी पहाड़ियों से निकलती है.  सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत मेरठ, गौतमबुद्ध नगर से होते हुए यमुना में मिलती हैं. इस दौरान यह 400 किलोमीटर की यात्रा तय करती है. अपनी इस यात्रा में यह फैक्ट्रीयों का सारा रसायन अपने अन्दर समेटती हैं. जो इसे एक बदबूदार भयावह नाला बना देता है. इसके प्रदूषित पानी की वजह से उन सभी जगहों पर कैंसर फैलने लगा है जहाँ से यह गुजर रही है. इसके किनारों पर बसे शहर और गाँवों के लोगों की याद में कभी यह एक ‘जीवनदायनी’ नदी हुआ करती थी. अब यह ‘जीवनदायनी’ नदी नहीं, ‘मौतदायनी’ नाला है. इस नदी की हालत पर सैंकड़ों रिपोर्ट्, दस्तावेज फिल्में और कहानियां लिखी जा चुकी हैं. विरोध-प्रदर्शन और आन्दोलन किये जा रहे हैं. इन सबका फैक्ट्री मालिकों और सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता. इसके किनारे बसे लोग जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं.

दोनों शोधार्थियों के जमीनी अनुभव दिल दहला देने वाले थे जिनसे पर्यावरण संकट की जमीनी हकीकत सामने आयी. यह साफ़ हो गया कि ‘मुनाफा’ केन्द्रित व्यवस्था इस संकट की जड़ है. जो हर रोज इस धरती और मानवता को निगलती जा रही है.

दूसरे सत्र के मुख्य वक्ता और अतिथि पदमश्री कल्याण सिंह रावत ने भी अपनी बात रखते हुए मौजूदा हालात पर अपनी चिन्ता जाहिर की. साथ उत्तराखण्ड में जगलों में बेशकीमती पेड़ों को नष्ट करने वाले कीड़े, ग्लेशियरों की हालत, ‘विनाशकारी’ विकास और संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में बढ़ती भीड़ से बुग्यालो पर आये संकट को लेकर आगाह किया.

सत्र के अन्तिम वक्ता कमलेश खंतवाल ने पर्यावरण संकट के लिए उद्योगपतियों की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि इन नीतियों को जनता की जागरूकता और एकजुटता से ही बदला जा सकता हैं.

इस एक दिवसीय सेमीनार में वक्ताओं ने पर्यावरण के मौजूदा हालातों पर गहराई और व्यापकता के साथ बात की. उनकी बातचीत में इस संकट के हर पहलू को समझा गया. जितनी तैयारी के साथ वक्ताओं ने ‘पर्यावरण संकट: समस्या और समाधान’ पेश किया उतनी ही मुस्तैदी के साथ श्रोताओं ने उन्हें सुना. दूरदराज के इलाकों से आये श्रोताओं की भारी संख्या में मौजूदगी इस बात की गवाह बनी.

धरती माँ की कराह सबको बैचेन कर रही है. इसलिए ‘चुप’ रहकर गुनाहगार बनने के बजाय हमें एकजुट होकर अपनी आवाज बुलन्द करनी चाहिए. सम्मेलन के समापन पर ‘पर्यावरण लोक मंच’ के साथियों का गाया गीत इसकी तस्कीद करता है....

हिम्मत बुलंद है अपनी, पत्थर सी जान रखते हैं

कदमों तले ज़मीं तो क्या, हम आसमान रखते हैं

गिरते हुओं को उठाने के लिये, तू जी, ऐ दिल, ज़माने के लिये

अपने लिये जिये तो क्या जिये...