Monday, 15 July 2019

केरल बाढ़ ने हमें क्या सिखाया?


हर मानसून में भारत के बहुत से हिस्सों में बाढ़ आना बहुत सामान्य घटना है, लेकिन इस साल केरल की बाढ़ एक ऐसा भयानक त्रासदी बनी कि उसने पूरे प्रान्त को तबाह कर दिया. प्राथमिक बचाव कार्य के बाद, राहत और पुनर्निर्माण केरल की प्राथमिकता बन चुकी है. सरकार अब मुआवजा देने की अक्षम्य ज़िम्मेदारी निभा रही है - 450 से भी ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और आजीविका के नुक्सान होने के कारण बहुतेरे लोग अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि केरल को मदद की जरूरत है और भारत में इसकी कोई कमी नहीं है.

नेचर कम्युनिकेशन  में प्रकाशित एक निवंध के अनुसार, एक ही साथ कुल बारिश की मात्रा में गिरावट और भारी बारिश की घटनाओं का बारबार और भारी उछाल हो रही है, जिसमें 1950-2015 के दौरान मध्य भारत में व्यापक भारी बारिश में तीन गुणा बढ़ोत्तरी हुई है. निश्चित रूप से इसका सम्बन्ध वैश्विक जलवायु परिवर्तन से है. दुनिया के सामने वैश्विक जलवायु परिवर्तन स्वीकार्य रूप से ही सबसे गंभीर समस्या है. इसकी भयावहता के बावजूद मुख्यधारा का अर्थशास्त्र इस समस्या हल करने की कोशिश करने और इसके जड़ तक पहुँचने में असमर्थ है. वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था— ‘मिडास प्रभाव’ यानी यह अवधारणा की पारिस्थिकी मूल्य को आर्थिक मूल्य में बदला जा सकता है,  के बावजूद गिर रही है.

भारत में नवउदारवादी शासन में पारिस्थितिकी और पर्यवरणविदों की बारबार चेतावनी के बावजूद जलवायु परिवर्तन की परिघटना बेलगाम “विकास” कार्यवाही के कारण – तुरंत मुनाफे की लालच में भारत के बहुत हिस्सों को तबाह कर रही है.

केन्द्रीय जल आयोग ने दर्शाया है कि हर साल बाढ़ के चलते 1650 से भी ज्यादा लोगों की मौत होती है, लगभग 3.2 करोड़ लोग प्रभावित होते है. हर साल 94,000 से भी ज्यादा मवेशियों का नुकसान होता है, 70 लाख हेक्टेयर से ज्यादा खेती की जमीन बर्बाद होती है. सन 1953 से 2016 तक के आँकड़ों के आधार पर यह हिसाब किया गया है. अगर इस पुरी समयावधि को दो हिस्सों में बाँट लिया जाये – 1953 से 1991 और 1992 से 2016 तक, तो दूसरा हिस्सा नवउदारवादी शासन को सूचित करता है. कोई भी देख सकता है कि पहली समयावधि में सालाना 1520 लोगों की मौत हुई जो दुसरी समयावधि में बढ़कर 1843 हो गयी है. और यह सब पिछले दो पीढ़ियों के तमाम वैज्ञानिक, तकनीकी और चिकित्सकीय तरक्की/अगुयाई के बावजूद हुआ.

केरल की बाढ़ सभी तर्कशील लोगों को पश्चिम घाट की पारिस्थितिकी पर आये दो रिपोर्टों पर गंभीर रूप से नज़र डालने को मजबूर कर रही है – एक 2011 में वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनेल के तरफ से माधव गाडगिल द्वारा पेश किया गया और दूसरा के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में हाई लेवल वर्किंग ग्रुप द्वारा पहले रिपोर्ट का एक कम प्रभावी रूप. लेकिन सभी सम्बंधित राज्यों – कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात और तामिलनाडू ने इस पैनेल द्वारा दिये गये सुझावों को नज़रअंदाज़ किया; इसमें साफ़-साफ़ कहा गया था की पूरा पश्चिम घाट क्षेत्र पारिस्थितिकी रूप से नाज़ुक घोषित करना (पैनेल ने पुरे क्षेत्र को तीन तरह की पारिस्थितिकी रूप से नाज़ुक हिस्सों में बाँटा था) आर्थिक कार्यवाही को गंभीर रूप से चोट पहूँचायेगा.

माधव गाडगिल अपने निवंध “वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनेल: एक पांच अंकों का नाटक” (इपीडब्लू, मई 2014) में बताया - वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनेल रिपोर्ट .... ने एक तीखा बहस पैदा किया है, यहाँ तक कि प्रदर्शन, विरोध और हिंसा भी. इसका मालयाली अनुवाद जो खूब बिका है, सरकार ने जब रिपोर्ट को दबा दिया तब केरल शाश्त्र साहित्य परिषद्, एक जनविज्ञान आन्दोलन ने प्रकाशित की ...... महाराष्ट्र में सरकार अपनी वेबसाईट पर जानबुझकर विकृत संक्षिप्त रूप मराठी में प्रकाशित किया जिसमें कहा गया की वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनेल ने कुछ ऐसे दानवीय प्रतिबंधनों को लोगों पर थोपने का नुस्खा दिया है जिसमें लोगों की राय नहीं है. साथ ही साथ कई राजनेता और नौकरशाह तथा केरल के चर्च के कुछ सदस्यों ने इस रिपोर्ट के बारे में भ्रम फैलाने का एक अभियान शुरू किया. इस अभियान ने नवम्बर 2013 में कन्नूर की पहाड़ी इलाकों में, कालिकट, मल्लापुरम, वायनाड और इडुक्की जिले में बड़े पैमाने पर  हिंसा भड़काया.

हिन्दुस्तान टाइम्स को दिये गये एक साक्षात्कार में, गाडगिल ने कहा, “केरल में अभी आयी बाढ़ और भूस्खलन के लिए गैरज़िम्मेदार पर्यावरण नीति ज़िम्मेदार है. हद से ज्यादा पत्थर तोड़ना और पर्यटन के नाम पर कुकुरमुत्ते की तरह ऊँची-ऊँची इमारतें बनना, और निजी संस्थाओं द्वारा वनभूमि पर गैरकानूनी कब्ज़ा करना ही केरल में आई बाढ़ के पीछे बड़ा कारण है.” गाडगिल के अनुसार कुल 1605 पत्थर खोदने का मशीन लगा हुआ है जिनमें से सिर्फ 150 को सरकारी अनुमति मिली है. गौर करने वाली बात यह है की बरसात से प्रभावित इलाकों में से ज्यादातर हिस्सा वही जिसे WGEEP रिपोर्ट में कभी पारिस्थितिकी रूप से नाज़ुक बताया गया था.

उत्तराखंड के बाढ़ पर सन 2013 में प्रफुल बिदवई ने गार्जियन में लिखा था कि उत्तराखंड की खतरनाक बाढ़ जिसने हज़ार से अधिक आदमी मर गए, 70,000 लोग कई दिनों तक फंसे रहे और जानमाल की भारी तबाही हुई, “सरकारी रूप से इसे एक प्राकृतिक तबाही कहा गया जो बादल फटने और अभूतपूर्व मानसूनी भारी बारिश के चलते हुआ है. हालाँकि, इस महात्रासदी की असली बजह पिछले कुछ समय से इलाके की पारिस्थितिकी को बिगाड़ने वाले पर्यटन उद्योग का तेजी से बढ़ोत्तरी, पारिस्थितिक रूप से नाज़ुक इलाकों में सड़कों, होटलों, दुकानों और बहुमंजिला मकानों का तीव्र फैलाव और सर्वोपरि कुकुरमुत्ते की तरह जलविद्युत बाँध का निर्माण जो जल संतुलन को बिगाड़ता है, उसमे निहित है. इस तबाही के लिए तरह तरह की सरकारी विफलता भी जिम्मेदार है.”
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिजास्टर मैनेजमेंट ने ‘उत्तराखंड डिजास्टर 2013’ में एक ज़ोरदार निष्कर्ष के तहत कहा – ‘पहाड़ी तराई क्षेत्र में सड़कों का निर्माण पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ने वाला प्रधान कारक है. ये जलनिकासी के ढाँचे को (सतही और भूगर्भ दोनों में) नुकसान पहूँचा सकता है, भुस्खलन बढ़ा सकता है, और मिटटी और चट्टानों में भारी हलचल पैदा करता है. अगर भूवैज्ञानिक, भू-रूपात्मक, पारिस्थितिकी पहलुओं को नज़रअंदाज़ करके सड़कों का निर्माण किया जाए तो पर्यावरण में गड़बड़ी और ज्यादा त्वरित होता है. वैज्ञानिकों ने गणना किया है की सड़कों के आस-पास भुस्खलन खेती की जमीन की तुलना में 10  गुणा ज्यादा, घास के मैदान की तुलना में 100 गुणा ज्यादा और वन-आच्छादन की तुलना में 2000 गुणा ज्यादा होता है. पहाड़ी तराई में एक किलोमीटर सड़क बनाने के लिए लगभग 60,000 क्यूबिक मीटर मलवा उस जगह से हठाना पड़ता है.’ उत्तराखंड में दुर्भाग्यवश ज्यादातर सड़कें ऐसे मुद्दों पर सोचे बिना ही बनाया जाता है, नतीजन अस्थिरता बढती है और भूस्खलन के लिए परिस्थिति तैयार हो जाती है.’ लेकिन 27 दिसम्बर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तराखंड के देहरादून में चार धाम राज मार्ग परियोजना का शिलान्यास किया. इस परियोजना का अनुमानित खर्चा 12,000 करोड़ रूपया है जिसका मकसद हिमालय में चार श्रद्धेय हिन्दू तीर्थस्थानों को सड़कों से बेहतर तरीके से जोड़ना. इसमें चार धाम स्थानों की दिशा में – गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ - 900 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग का चौड़ीकरण शामिल है. सरकार का मौखिक मकसद बारहमासी सड़क तथा सुरंगों, बाईपास और पुलों की श्रृंखला बनाकर इन जगहों तक की यात्रा और सुरक्षित और तेज करना है. निहित स्वार्थ तथा उद्दंडता और अज्ञान के चलते कैसे वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर दी गयी चेतावनी को धार्मिक भावना तथा क्षुद्र आर्थिक लाभ के लिए नकारा जाता है, यह साबित करने के लिए व्याख्या की जरूरत नहीं है.

कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इस बात में असहमत नहीं होगा कि तुरंत मुनाफे के लक्ष्य को सर्वोपरि रखने की नवउदारवादी नीति लाजिमी तौर पर भारत में लगातार बढ़ती हुई पारिस्थिकी तबाही लाएगी. यह विवरण दिखाता है कि जब धार्मिक भावना के साथ राजनीतिक तिकड़म घुलमिल जाता है तो स्थिति और खराब होता है. यह दोहरा भ्रम – जिससे हमारी मौजूदा राजनीति पहले से ही जुड़ी हुई है – कि मुनाफे का अँधा दौड़ या किसी दैवीय रामवाण के चलते  आने वाली पर्यावरण तबाही हमारे बच्चे और उनके बच्चों को निगल जायेगी, बचा जा सकता है, एक ऐसा दुश्मन है जिसका सामना तर्कवादी कार्यकर्ताओं को करना पड़ेगा. नवउदारवादी हमले के खिलाफ जनता की रोज़-रोज़ की लड़ाई में जनविज्ञान आन्दोलन एक महत्वपूर्ण मित्र है और इसे जितना हो सके हमें हर संभव सहयोग देना होगा.

सुभाष आयकात

Wednesday, 5 June 2019

कोप–24 में जलवायु समस्या पर समझौतावादी रवैया


संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन कांफ्रेन्स का 24वाँ (कोप–24) सम्मेलन पर्यावरण संकट का हल निकाल पाने में सफल न हो सका। यह सम्मेलन 2 से 15 दिसम्बर 2018 को पोलैण्ड के केटोवाइस शहर में आयोजित किया गया था। दुनियाभर में पर्यावरण के मुद्दे पर चल रहे छोटे–बड़े हजारों आन्दोलनों का दबाव ही था जिसके चलते इस सम्मेलन में इस समस्या पर विचार–विमर्श किया गया कि 2015 के उस विवाद को कैसे निबटाया जाये जो पेरिस जलवायु समझौते में गरीब और अमीर देशों के बीच कार्बन उत्सर्जन की सीमा तय करने को लेकर पैदा हो गया था। हम जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन पर अन्तरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) की उस रिपार्ट को सऊदी अरब, अमरीका, कुवैत और रूस खारिज कर चुके हैं जिस रिपोर्ट में कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार ठहराये गये देशों में इनका भी नाम था। कोप–24 में बीच–बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की गयी। सम्मेलन में यह बात भी खुलकर सामने आ गयी कि दुनियाभर की शासन–सत्ता में अंधराष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी उभार होने के चलते जलवायु परिवर्तन पर होने वाली अन्तरराष्ट्रीय वार्ताओं और समझौतों में बाधा पड़ रही है। इसे लेकर कोप–24 में चिन्ता भी व्यक्त की गयी।

इस सम्मेलन में दुनियाभर से 23,000 प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रतिनिधियों ने इस बात पर सहमति जाहिर की कि एक नयी अन्तरराष्ट्रीय जलवायु पद्धति बनायी जाये जिसके तहत यह अनिवार्य किया जाये कि सभी देश कार्बन उत्सर्जन और उसमें कटौती से सम्बन्धित अपनी रिपोर्ट हर दो साल में पेश करें। यह व्यवस्था 2024 से लागू होगी। लेकिन देशों के ऊपर एक बार फिर कटौती से सम्बन्धित कोई बाध्यकारी नियम और उपाय लागू नहीं किया गया। इसके चलते दुनियाभर के उन पर्यावरणवादियों को बहुत निराशा हुई जो कोप–24 से बहुत अधिक उम्मीद पाले बैठे थे। इसी सम्मेलन में उत्सर्जन से सम्बन्धित जो रिपार्ट पेश की गयी, उससे साफ पता चलता है कि कार्बन के वैश्विक उत्सर्जन में कमी नहीं हो रही है बल्कि इसमे बेतहासा वृद्धि हो रही है।
 



आश्चर्य की बात यह है कि जिस शहर केटोवाइस में कोप–24 की कांफ्रेन्स आयोजित की गयी थी, वह सिलेसिया का कोयला बाहुल्य क्षेत्र है। इस बात ने कांफ्रेन्स के माहौल को दूषित कर दिया कि कोयला क्षेत्र की कई दिग्गज कम्पनियों को बातचीत के लिए कोप–24 में आमन्त्रित किया गया था। कांफ्रेन्स से कुछ दिन पहले ही पोलैण्ड ने अपने यहाँ एक नये कोयला खदान को खोलने का फैसला किया था। यह बात गौर करने वाली है कि पोलैण्ड की लगभग 80 प्रतिशत बिजली कोयले से बनायी जाती है, जो प्रदूषण का भयानक स्रोत है। केटोवाइस शहर की हवा में कोयले के इतने बारिक कण और जहरीला धुआँ भरा हुआ था कि प्रतिनिधियों को भी खुली हवा में साँस लेने में दिक्कत हुई। आम शहरवासियों की बात ही क्या? कोढ़ में खाज यह कि जिस जगह कांफ्रेन्स चल रही थी, उसे कोयले के विविध उत्पादों से सजाया गया था, मानो यह जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन न हो, बल्कि कोयले के उत्पादों का कोई व्यापार मेला हो। ये सभी घटनाएँ दिखाती हैं कि दुनियाभर की सरकारें जलवायु परिवर्तन के विविध सम्मेलनों में महज औपचारिकता के लिए शामिल होती हैं, जलवायु संकट के समाधान के लिए नहीं। इनसे कोई हल निकलेगा, यह सोचना बेमानी है।


लेकिन सम्मेलन चाहे विफल हो जायें, जलवायु संकट की रफ्तार बढ़ाती ही जा रही है। यूनिवसिर्टी ऑफ ईस्ट एंजलिया और ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट ने अपने शोध में पाया कि दुनियाभर में कुल कार्बन का उत्सर्जन 2018 में यह 3710 करोड़ टन के रिकार्ड ऊँचे स्तर तक पहुँच गया। भारत दुनिया में उत्सर्जन के मामले में तीसरे स्थान पर है। इस रिपोर्ट में 2017 के भारत के उत्सर्जन में 6.3 प्रतितशत की वृद्धि दर्शायी गयी है। 2017 में विश्व के कुल उर्त्सजन में 1.6 प्रतिशत और 2018 में 2.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्शायी गयी। कार्बन उत्सर्जन में यह वृद्धि कोयला, गैस और तेल के बढ़ते इस्तेमाल के चलते हुई है। 2018 में दुनिया के 10 बड़े उत्सर्जक हैं–– चीन, अमरीका, भारत, रूस, जापान, जर्मनी, ईरान, सऊदी अरब, साउथ कोरिया और कनाडा। अगर यूरोपीय संघ को क्षेत्र विशेष की तरह माने तो वह तीसरे स्थान पर आयेगा। आज दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में चीन की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है। 2018 में उसके उत्सर्जन में 4.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अमरीका जो पेरिस समझौते से भाग खड़ा हुआ था, 2018 के वैश्विक उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी 15 प्रतिशत थी, जिसमें कई सालों तक कमी के बाद पिछले साल 2.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह एक बेहद चिन्ताजनक बात है।


कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा ने पर्यावरण के बड़े संकटों को जन्म दिया। आज से कुछ साल पहले पर्यावरण वैज्ञानिक जिन विभीषिकाओं की सम्भावना जताया करते थे, वह अब कोई दूर की बात नहीं रह गयी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने एक अध्ययन में पाया कि वायु प्रदूषण के चलते हर साल दुनियाभर में 70 लाख लोगों की मौत हो जाती है और इस समस्या से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं में लगभग 35,768 अरब रुपये हर साल खर्च करने पड़ते हैं। इसके बावजूद लोगों को अच्छे स्वास्थ्य की सुविधा उपलब्ध नहीं करायी जा सकी है। इस अध्ययन में यह भी पता चला कि जलवायु परिवर्तन प्रकृति में इनसानी दखलंदाजी बढ़ने के चलते हो रहा है जो बीमारियों का कारण बन रहा है।

ऑक्सफोर्ड जलवायु परिवर्तन संस्थान के शोधकर्ताओं का मानना है कि औद्योगीकरण के पहले दुनिया का तापमान अपवाद स्वरूप ही बढ़ता था। वह भी हजार सालों में एक बार। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आज के जलवायु परिवर्तन का सीधा सम्बन्ध मानव निर्मित पर्यावरण प्रदूषण से है। यह बात उन्होंने उस समय कही, जब अमरीका दुनियाभर में यह प्रचारित कर रहा है कि जलवायु परिवर्तन एक स्वभाविक प्रक्रिया है। इसका औद्योगीकरण और मानवीय क्रियाकलाप से कोई सम्बन्ध नहीं है।


भारत और अमरीका समेत दुनिया के कई अन्य देशों में दक्षिणपंथी सरकारों ने सत्ता की कुर्सी पर काबिज हुई हैं। जैसा कि सभी जानते हैं, 2008 के बाद आयी वैश्विक आर्थिक मन्दी का समाधान न तो किसी देश की सरकार और न ही पूँजीपति वर्ग कर सका। यह मन्दी व्यवस्था का चिरन्तन संकट बन गयी है। अपनी पूँजी को संकट से उबारने के लिए दुनियाभर के पूँजीपतियों ने ऐसी दक्षिणपंथी सरकारों को अपना समर्थन देना शुरू किया है जो उनके मुनाफे की हवस पूरी करने के आगे न तो अपने देश की जनता के हितों की परवाह करती हैं और न ही पर्यावरण की। भारत में भाजपा सरकार ने उन परियोजनाओं को एकतरफा मंजूरी दे दी जो पर्यावरण के लिहाज से बेहद खतरनाक हैं। यही हाल अमरीका, ब्राजील आदि देशों का भी है। सवाल यह है कि क्या ऐसी सरकारें जो अपने देशों के पर्यावरण को प्रदूषित करने में कॉपोरेट घरानों की मदद कर रही हैं, वे इस समस्या के समाधान के लिए गम्भीरता से कदम आगे बढ़ायेंगी। क्योटो सम्मेलन से लेकर कोप–24 तक के सम्मेलन इसका उत्तर ‘न’ में देतेे हैं। जाहिर सी बात है कि दुनिया में पर्यावरण संकट तेजी से बढ़ता जा रहा है लेकिन दुनियाभर की सरकारें इसे लेकर गम्भीर नहीं हैं।
 
जिस तेज रफ्तार से जलवायु परिवर्तन से होने वाली तबाही की गिरफ्त में दुनिया फँसती जा रही है और इसके दुष्परिणाम दुनियाभर की जनता को झेलने पड़ रहे हैं, वह एक गम्भीर चिन्ता की बात है। लेकिन यह भी सच है कि पर्यावरण सम्मेलनों की असफलता ने निराशा को बढ़ाया ही है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश अपने राष्ट्रीय हितों, यानी वहाँ के पूँजीपतियों के संकीर्ण वर्गीय हितों से समझौता करने को तैयार नहीं हैं। इसी के चलते 2015 के पेरिस समझौते से निकले समाधान को इन देशों ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। इस समझौते में यह तय किया गया था कि इस शताब्दी के अन्त तक दुनिया के तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री से नीचे रखा जायेगा। अब से अगर सभी देश यह लक्ष्य मान लें तो उन्हें सामूहिक रूप से 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 50 प्रतिशत की कटौती करनी होगी और 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को शून्य करना होगा।


–– विक्रम प्रताप

(देश-विदेश अंक-31 )