Sunday, 3 March 2019

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को रोको नहीं तो दुनिया प्लास्टिक के ढेर में बदल जायेगी

आज पीने के पानी से लेकर हमारे शरीर तक में प्लास्टिक के कणों की भारी संख्या में मौजूदगी हमारे लिए गम्भीर खतरा बनती जा रही है। दूध–दही, चीनी, शहद से लेकर अन्य खाद्य सामान प्लास्टिक के पैकेट में पैक होकर आ रहे हैं, जिनमें भारी संख्या में प्लास्टिक के कणों की मौजूदगी से सम्पूर्ण जीवन चक्र संकट में है। खाद्य पदार्थों और पानी के माध्यम से ये प्लास्टिक के कण हमारे शरीर में चले जाते हैं जो कैंसर सहित और अन्य घातक बीमारियों को जन्म दे रहें हैं। प्लास्टिक कचरे के बारे में हमें सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि आज हमारी जमीन, नदियाँ और समुद्र प्लास्टिक कचरे के ढेर से पटते जा रहे हैं। 


प्लास्टिक कचरे की मौजूदगी हमारे परिस्थितिकीय तंत्र के सन्तुलन को बिगाड़ रही है। अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून के मुताबिक पिछले 10 सालों में प्लास्टिक कचरे का उत्पादन 40 प्रतिशत बढ़ गया है। प्लास्टिक कचरे के उत्पादन की दर में ये वृद्धि आने वाले सालों में गम्भीर खतरा बन जायेगी। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार भारत में प्रतिदिन 25,490 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। जिसमें से 15000 टन कचरे का ही प्रतिदिन एकत्रीकरण और पुन:नवीनीकरण हो पाता है। शेष कचरा (40 फीसदी) जमीन पर कूड़े का ढेर बनता है या फिर नालियों को जाम करता है। नदियों से होता हुआ महासागरों में चला जाता है।
 
जर्मनी के हेमहोल्त्ज सेंटर फॉर एनवायरमेंटल रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक समुद्र के कुल प्लास्टिक कचरे का 90 फीसद एशिया और अफ्रीका की दस नदियों से आता है। इसमें पहले और दूसरे स्थान पर क्रमश: चीन की याँग्त्सी और भारत की सिंधु नदी है। प्लास्टिक कचरे को ढोने की दस बड़ी नदियों की सूची में गंगा नदी 6वें स्थान पर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक गंगा नदी हर साल 5.44 लाख टन प्लास्टिक कचरा बंगाल की खाड़ी में डालती है। जबकि पहले स्थान पर चीन की याँग्त्सी नदी है जो सालाना 15 लाख टन प्लास्टिक अपने महासागरों में उड़ेल देती है। 

ब्रांडेड प्लास्टिक कचरा आज विश्व के लिए गम्भीर समस्या का रूप ले चुका है। ग्रीनपीस की हालिया रिपोर्ट में बताया गया कि वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा फैलाने में दुनिया की बड़ी माल उत्पादक ब्रांडेड बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ शीर्ष पर है— जिनमें कोका–कोला, पेप्सिको और नेस्ले, डेनोन, मोंडेलेज इंटरनेशनल, प्रोक्टर एंड गैंबल, यूनिलीवर, पेर्फेटी वैन मेलले, मार्स, और कोलगेट–पामोलिव शामिल हैं। इनमे से शीर्ष तीन कम्पनियाँ ( कोका कोला, पेप्सिको और नेस्ले ) ही अकेले कुल प्लास्टिक कचरे का 14 प्रतिशत प्लास्टिक कचरा फैलाती हैं। दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्ट ड्रिंक बनाने वाली कम्पनी कोका–कोला सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा करने वाली कम्पनी है। साफ है कि जितनी बड़ी उपभोक्ता माल उत्पादक कम्पनी उतनी ही बडी कचरा उत्पादक कम्पनी।
ब्रांडेड कम्पनियाँ अपने उत्पादों की पैकेजिंग और लेबलिंग के लिए भारी पैमाने पर प्लास्टिक का इस्तेमाल करती हैं। इन कम्पनियों द्वारा इस्तेमाल कुल प्लास्टिक कचरे के केवल 9 प्रतिशत भाग का ही पूनर्नवीनीकरण हो पता है। जबकि शेष बचे भाग को जला दिया जाता है या जमीन पर कूडे के ढ़ेर के रूप में एकत्रित होता रहता है या फिर नदियों के रास्ते महासागरों में पहुँच जाता है।  

बहुराष्ट्रीय निगम विकासशील देशों के बाजार अपने उत्पादों के उत्पादन और बिक्री के लिए चुनते हैं। क्योंकि विकाशशील देशों में इन कम्पनियों को सस्ता श्रम और लचीला पर्यावरण कानून मिलता है। पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ सस्ते मैनुफेक्चुरिंग और अत्यधिक मुनाफा कमाने को सदैव लालायित रहती हैं। जिसके चलते यह ब्रांडेड बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्पादों के लिए सस्ता और एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक का उपयोग करती हैं। जिससे ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जबर्दस्त मुनाफा बटोरती हैं। विकसित देशों की यह कम्पनियाँ आज विकासशील देशों की जमीन, नदियों और महासागरों को अपने मुनाफे के चक्कर में आगामी सैकड़ों सालों के लिए दूषित कर रहीं है। हालत ऐसे ही रहें तो हमारी कई पीढ़ियाँ इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा फैलाये गये प्लास्टिक कचरे के बोझ से उबर नहीं पाएगी। 



बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार 34 समुद्री पक्षियों में से 74 प्रतिशत समुद्री पक्षियों में प्लास्टिक कचरे का अवशेष पाया गया। फोएकी के मुताबिक महासागरों में पाये जाने वाले प्लास्टिक से हर साल 1,00,000 से ज्यादा जलीय स्तनधारियों की मौत हो जाती है। जबकि 86 प्रतिशत कछुए इन प्लास्टिक को निगल लेते हैं। अगर इसी तरह से ब्रांडेड कचरा नदियों और समुद्रों में डंप किया जाता रहेगा तो समुद्र में  पाये जाने वाली विभिन्न प्रजातियों के जीवों के अस्तित्व पर खतरा और गम्भीर हो जायेगा।



ग्रीन पीस की रिपोर्ट के मुताबिक महासागरों में पाये जाने वाले प्लास्टिक कचरे में एकल उपयोग प्लास्टिक का कचरा– विभिन्न उत्पादों की पन्नियाँ, पानी की बोतलें, काफी के कप, स्ट्रा, प्लास्टिक बैग और बोतलों के ढक्कन बड़े पैमाने पर पाये गये। फोएकी के मुताबिक एकल उपयोग प्लास्टिक के विघटन में लगभग 100–500 सालों का समय लगता है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ ज्यादा मुनाफा और कम से कम लागत मूल्य आये इसलिए ज्यादा से ज्यादा एकल उपयोग प्लास्टिक का इस्तेमाल करती हैं।


बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और निगमों के मुनाफे में सरकारों का भी बड़ा हिस्सा होता है। जिसके चलते विकासशील देशों कि सरकारें इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपने यहाँ न सिर्फ न्योता देती है बल्कि इन कम्पनियों के लिए श्रम कानूनों और पर्यावरण मानकों को ढीला करती हैं। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ यहाँ के श्रम और प्राकृतिक स्रोतों का जबर्दस्त तरीके से दोहन कर अपना माल बनाती हैं और यहाँ की जनता से मुनाफा निचोड़ती हैं। साथ ही इससे उत्पन्न कचरे से वहाँ की जमीन, नदियों और महासागरों को दूषित करती हैं। आज ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ विकसशील देशों को अपना डस्टबीन बनायें हुए हैं। इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा फैलाये गये कचरे से होने वाली बीमारियों का खामियाजा विकासशील देशों की जनता को पीढ़ी दर पीढ़ी भुगतना पड़ रहा है।


अन्तरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पर्यावरण मानकों को ताक पर रखकर ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ फलफूल रहीं हैं। सरकारें इनकी सहायक हैं। ऐसे में विकसित और विकासशील देशों की जनता के सचेतन प्रयास से ही हम पृथ्वी को इन दैत्याकार कम्पनियों के प्रदूषण से बचा सकते हैं। पर्यावरण का संकट आज सम्पूर्ण मानवता और मानवजाति के अस्तित्व का संकट है। इसे सम्पूर्ण जनता के जुझारू और सचेतन प्रयासों से ही हल किया जा सकता है। 

--अनुराग              
                 
(देश-विदेश-30 पत्रिका से साभार)

Saturday, 2 March 2019

आईपीसीसी की जलवायु संकट पर नयी रिपोर्ट विनाश की ओर बढ़ती मानव जाति

                             
जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों के कारण हमारी धरती और पूरी मानव सभ्यता पर तबाही का खतरा मंडरा रहा है। पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र का जलस्तर ऊपर उठ रहा है। पीने का पानी जहरीला होता जा रहा है। भारी वर्षा और सूखा दुनिया भर में तबाही मचा रहे हैं। खेती उजड़ती जा रही है। जीवों की कई प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर आ गयी हैं। यदि यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब पूरी मानव सभ्यता बर्बाद हो जायेगी।  

8 अक्टूबर 2018 को जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑफ क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने अपनी नयी रिपोर्ट जारी करके चेतावनी दी। इस रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक दुनिया का तापमान पूर्व औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री तक बढ़ जायेगा। तापमान पूर्व औद्योगिक स्तर से एक डिग्री पहले ही बढ़ गया है। जिसके परिणाम पूरी दुनिया में देखने को मिल रहे हैं। आर्कटिक सागर की बर्फ तेजी से पिघल रही है। समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। 90 फीसदी ग्लेशियर पीछे खिसकते जा रहे है। इस वर्ष जून और जुलाई महीनों में केवल कैलिफोर्निया के वनों में 140 बार आग लगी। ग्रीस में जंगलों में लगी आग से 80 लोग मारे गये। यूरोप गरम हवाओं से तपता रहा। भारत में बिना मौसम के आये धूल के तूफानों ने 500 से अधिक लोगों की जान ले ली। दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर में सूखे में तीन गुना बढ़ोतरी हुई। जापान, भारत, अमरीका तथा अन्य जगहों पर बेतहाशा बारिश होने से फसल और घर नष्ट हो गये। ये सारी घटनाएँ असामान्य हैं। आने वाले दिनों में अजीबोगरीब मौसम की यह तीव्रता और अधिक बढ़ने वाली है। यदि मौसम से जुड़ी ऐसी घटनाएँ एक डिग्री पर महसूस की जा रहीं हैं जो कि औद्योगिक युग के पूर्व का स्तर है,  तो 1.5 डिग्री की वृद्धि पर तो परिस्थितियाँ असहनीय हो जायेंगी।

आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार तापमान को पूर्व औद्योगिक स्तर के ऊपर अधिकतम 1.5 डिग्री तक रखना होगा। यदि तापमान इससे अधिक हो गया तो भारतीय उप महाद्वीप में भी इसके घातक परिणाम देखने को मिलेंगे। आईपीसीसी और दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन मानवनिर्मित है। रिपोर्ट के अनुसार यदि दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री से अधिक बढ़ा तो भयानक गर्मी और लू की चपेट में आकर 35 करोड़ लोग मारे जायेंगी। भयानक सूखा,  बे मौसम बारिश, बाढ़, तूफान आदि बढ़ेंगे। कई जीव-जन्तु विलुप्त हो जायेंगी। यदि तापमान दो डिग्री को पार करता है तो स्थिति और विनाशकारी हो जायेगी। समुद्र तटीय इलाके समुद्र में डूब जायेंगी जिससे करोड़ों लोग बेघर हो जायेंगी। एशिया और अफ्रीका की कृषि अर्थव्यवस्थाएँ अधिक प्रभावित होंगी। फसल की पैदावार में गिरावट और जलवायु अस्थिरता के कारण 2050 तक गरीबों की संख्या कई अरब के आँकड़े तक पहुँच जायेगी। यदि वर्तमान गति से पर्यावरण प्रदूषण जारी रहा तो आने वाले 75 वर्षों में पृथ्वी के तापमान में 3 से 6 डिग्री की वृद्धि हो सकती है। इसके चलते बर्फ के पिघलने से समुद्री जल–स्तर में एक से 12 फीट तक की वृद्धि हो सकती है और मुम्बई, न्यूयार्क, पेरिस, लन्दन, मालदीव, हालैण्ड और बांग्लादेश के अधिकांश भूखण्ड समुद्र में जलमग्न हो सकते हैं। इन घटनाओं के कारण भुखमरी गरीबी, असमानता, बीमारी तेजी से बढ़ेगी। पूरी मानव सभ्यता अस्त–व्यस्त हो जायेगी।
पर्यावरण प्रदूषण का कारण वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि है। पृथ्वी से उत्सर्जित होने वाली ऊर्जा को अवशोषित करने वाली गैसें ग्रीन हाउस गैस कहलाती हैं। इनमें कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन और जलवाष्प शामिल हैं। ये गैसें सूर्य की ऊर्जा को अन्दर आने देती हैं परन्तु बाहर नहीं जाने देती हैं। वायुमण्डल में जब इन गैसों की मात्रा बढ़ जाती है तो पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगता है और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या पैदा होती है।
औद्योगिक क्रान्ति के बाद से विकास की जो तीव्र प्रक्रिया अपनायी गयी है उसमें पर्यावरण की अवहेलना की गयी, जिसका परिणाम आज पारिस्थितिकीय असन्तुलन और पर्यावरणीय संकट के रूप में हमार सामनेे उपस्थित है। आज विश्व के विकसित देश हो या विकासशील देश, कोई भी पर्यावरण प्रदूषण के कारण उत्पन्न गम्भीर समस्याओं से अछूते नहीं हैं।
1990 के दशक में पूरी दुनिया व्यापार समझौतों से एक सूत्र में बँधने लगी थी और उत्पादों की स्वतंत्र तथा निर्बाध आवाजाही क के लिए नियम बनाये गये। वैश्वीकरण ने एक ऐसी अन्तर्निर्भर दुनिया बनाने की कोशिश की जिसमें सस्ते श्रम का इस्तेमाल कम्पनियों का मुनाफा बढ़ाने के लिए किया जाने लगा। अगले दो दशकों में चीन वैश्विक बाजार के लिए उत्पादों का आपूर्तिकर्ता बनकर सामने आया और उपभोग भी खूब बढ़ा। 1990 के दशक में ही दुनिया ने जलवायु परिवर्तन को सीमित दायरे में रखने पर भी सहमति जतायी थी। यह आर्थिक भूमंडलीकरण के बरक्स पारिस्थितिकीय भूमंडलीकरण था लेकिन यह अपना मकसद हासिल करने में नाकाम साबित हुआ है।
व्यापार ने जलवायु को पीछे छोड़ दिया जबकि उत्सर्जन नियंत्रण पर उपभोग भारी पड़ गया। आर्थिक भूमंडलीकरण की सफलता उत्सर्जन स्तर में बढ़ोतरी के रूप में दिखने लगी। समृद्ध देशों ने कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करने वाले उत्पादों का इस्तेमाल कम नहीं किया बल्कि उलटा ही इन देशों का उत्सर्जन स्तर बढ़ गया। इसका नतीजा यह हुआ है कि हमारी धरती एक जलते तवे की तरह हाती जा रही है।

वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण कार्बन का उत्सर्जन है। अमरीका चीन के बाद सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जित करता है। रिपोर्ट में कार्बन उत्सर्जन को 2050 तक शून्य करने के लिए कहा गया है परन्तु क्या पूँजीवादी व्यवस्था में यह सम्भव है? कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए कई अन्तरराष्ट्रीय वार्ताएँ की गयी। क्वेटो प्रोटोकॉल के तहत यह कानून बनाया गया कि औद्योगिक देशों को ग्रीन हॉउस गैसों के उत्सर्जन में 2008-2012 तक 5.2 फीसदी कमी करनी है जिसमें से यूरोपीय संघ को 8 फीसदी, अमरीका को सात फीसदी और जापान को सात फीसदी कमी लानी थी। साम्राज्यवादी देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती से बचने के लिए उत्सर्जन परमिट की अदला–बदली करने का नया तरीका सुझाया जिसका मुख्य उद्देश्य था–– अमीर देशों के उत्सर्जन को बरकरार रखना। अमरीका हमेशा कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने से बचता रहा है। 2007 में बाली सम्मेलन में अमरीका ने क्वेटो प्रोटोकॉल के लक्ष्य को गिराकर उत्सर्जन कटौती की समय सीमा को बढ़ाकर 2012 से 2020 तक करने और न्यूनतम तापमान औद्योगिक क्रान्ति के स्तर से दो डिग्री तक अधिक रखने का सुझाव दिया। 2009 में कोपेनहेगेन सम्मेलन में भी अमरीका और उसके पिछलग्गू देश बेहद षड़यंत्रकारी तरीके से अपने आप को उत्सर्जन कटौती से बचाने में सफल हो गये। उत्सर्जन में कटौती के लिए उठाये जाने वाले कदमों को लेकर सारी दुनिया लुकाछिपी खेल रही है। उत्सर्जन स्तर में कटौती सम्बन्धी वैश्विक समझौतों को इस प्रकार तैयार किया गया है कि वे जलवायु परिवर्तन को नकार रहे हैं। जब भी कोई रिपोर्ट अमरीका के हितों से टकराती है अमरीका या तो उसमें बदलाव करवा देता है या उसे मानने से इनकार कर देता है। अमरीका ने जलवायु परिवर्तन समझौते को इस तरह लिखने के लिए बाध्य कर दिया कि उसके लक्ष्य वैज्ञानिक मानकों पर न होकर स्वैच्छिक कदमों पर आधारित थे। हरेक देश को अपने हिसाब से लक्ष्य तय करने की छूट दी गयी। इससे आवश्यक कदम उठाने में कमजोरी आयी। ऐसा लगता नहीं है कि धरती के तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस के भीतर भी सीमित रखा जा सकेगा, 1.5 डिग्री सेल्सियस तो बहुत दूर की बात है। पेरिस समझौते ने बुनियादी तौर पर देशों की जवाबदेही को बहुत कम कर दिया है। यह समझौता अमरीकी सरकार को खुश करने के लिए किया गया था। 

सच्चाई यही है कि अमरीका और अन्य साम्राज्यवादी देश मिलकर ऐसी नीतियाँ बनवाने में सफल हो जाते हैं जो उनके हित में हो। ये देश किसी भी कीमत पर अपने मुनाफे में कमी नहीं आने देना चाहते हैं। दुनिया में सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन चीन करता है जो 2015 में कुल वैश्विक उत्सर्जन का 29.51 प्रतिशत था। अमरीका 14.34 प्रतिशत के सााथ दूसरे स्थान पर तथा भारत 6.81 प्रतिशत के सााथ चौथे स्थान पर था। लेकिन चीन और भारत की जनसंख्या बहुत अधिक है, लिहाजा 2015 में चीन का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन 7.7 टन और भारत का 1.9 टन सालाना था। इस हिसाब से दुनिया के इन तीन शीर्ष देशों में उत्सर्जन कम करने में अमरीका की जिम्मेदारी अधिक बनती है। लेकिन अमरीका कार्बन उत्सर्जन को कम नहीं करना चाहता क्योंकि ऐसा करने से उसके मुनाफे में कमी आ जायेगी। बाली सम्मलेन से पहले अमरीका के येल विश्वविद्यालय ने एक सर्वे कराया था, जिसमें 68 प्रतिशत अमरीकी नागरिकों ने इस राय से सहमति जताई थी कि अमरीका वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में 90 प्रतिशत तक की कटौती करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर करे। फिर भी अमरीकी सरकार ने ऐसा नहीं किया क्योंकि अमरीकी सरकार बहुराष्ट्रीय एकाधिकारी पूँजीपतियों के लिए काम करती है जो पृथ्वी को तबाही की ओर ले जा रहे हैं। वे केवल अपने मुनाफे के बारे में सोचते हैं। वे अपने मुनाफे की हवस में इतने अँधे हो गये हैं कि पर्यावरण की समस्या मानने से भी इनकार कर रहे हैं। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी जलवायु परिवर्तन की समस्या से ही इनकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि अमरीका को और अधिक कोयला खनन करने और बिजली सयंत्र बनाने की जरूरत है ताकि उत्पादन को और अधिक बढ़ाया जा सके। ऐसे में अमरीका से ये उम्मीद करना कि वह जलवायु परिवर्तन की समस्या के बारे में गम्भीरता से सोचेगा मूर्खता होगी। यदि दुनिया अमरीका के रास्ते पर चली तो ग्रीन हॉउस गैसों का उत्पादन और बढ़ेगा जिसका असर दुनिया की उस भोली–भाली गरीब जनता पर पड़ेगा जो इस सबके लिए जिम्मेदार भी नहीं है और उससे बचने का उसके पास कोई उपाय भी नहीं है।                                                                                                      --सन्देश कुमार